शुक्रवार 17 जुलाई 2026 - 14:17
इमाम की मारफ़त क्यों ज़रूरी है?

सबसे पहले यह जानना ज़रूरी है कि मारिफ़त से क्या मतलब है और इसके शाब्दिक अर्थ क्या हैं। इसके बाद यह बात स्पष्ट होगी कि हदीसों में मारिफ़त को इतनी अहमियत क्यों दी गई है और हमसे किस तरह की मारिफ़त मांगी गई है।

लेखिका: रिज़वाना

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी | सबसे पहले यह जानना ज़रूरी है कि मारिफ़त से क्या मतलब है और इसके शाब्दिक अर्थ क्या हैं। इसके बाद यह बात स्पष्ट होगी कि हदीसों में मारिफ़त को इतनी अहमियत क्यों दी गई है और हमसे किस तरह की मारिफ़त मांगी गई है।

भाषा में मारिफ़त के मायने हैं: जानना, पहचानना और किसी हकीकत से आगाह होना।

हदीसों में मारफ़त की अहमियत

अल्लाह के रसूल ने इरशाद फरमाया:
"जो शख्स अपने ज़माने के इमाम की मारिफ़त के बिना मर जाए, वह जाहिलियत की मौत मरता है।"

इस हदीस पर ग़ौर करने से कुछ अहम नुक्ते सामने आते हैं।

हदीस में यह नहीं फरमाया गया कि वह जाहिल (अज्ञानी) मरेगा, बल्कि फरमाया गया कि वह जाहिलियत की मौत मरेगा। जाहिलियत से मुराद इस्लाम से पहले का वह दौर है जो गुमराही, शिर्क (बहुदेववाद) और हक़ से दूरी का ज़माना था। इस बिना पर हदीस का मतलब यह है कि जो शख्स अपने ज़माने के इमाम की मारिफ़त के बिना दुनिया से जाए, वह गुमराही और शिर्क की हालत में दुनिया से रुखसत होता है।

इसी हदीस के बारे में जब इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम से सवाल किया गया तो आपने फरमाया:
"जाहिलियत की मौत से मुराद गुमराही की मौत है।"
इसी तरह एक शख्स ने इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम की खिदमत में अर्ज़ किया:
"मैं आप पर कुर्बान हूँ! जो शख्स जाहिलियत की मौत मरे, उसका अंजाम क्या होगा?"
इमाम ने फरमाया:
"वह मुशरिक (बहुदेववादी) मरेगा।"

इन रिवायतों से अंदाज़ा होता है कि शरीयत में मारिफ़ते इमाम की कितनी अज़ीम अहमियत है, क्योंकि यही इंसान को गुमराही और शिर्क से महफूज़ रखती है। अगरचे इंसान इबादत करता रहे, लेकिन अगर सही मारिफ़त से महरूम हो तो उसकी इबादत भी उसे मतलूबा मंज़िल (वांछित मुकाम) तक नहीं पहुँचा सकती।

इंसान जब तक अपने रब की मारिफ़त हासिल न कर ले और अपने ख़ालिक़ (रचयिता) को न पहचान ले, वह हकीकत में किसकी इबादत कर रहा है और किसके सामने सर-ए-तस्लीम (समर्पण का सिर) ख़म कर रहा है?

इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम से मनक़ूल है:
अल्लाह तआला मारिफ़त के बिना किसी अमल (कर्म) को क़ुबूल नहीं फरमाता, और मारिफ़त भी उस वक़्त तक सूदमंद (लाभकारी) नहीं होती जब तक उसके साथ अमल न हो।
जिसे हक़ीक़ी मारिफ़त नसीब हो जाए, वही मारिफ़त उसे अमले सालिह (नेक कर्म) की तरफ रहनुमाई करती है।

अब तक दरज-ज़ेल नतीजे स्पष्ट हो चुके हैं:

  1. जो शख्स इमामे ज़माना की मारिफ़त के बिना मरे, वह जाहिलियत की मौत मरता है।

  2. जो इमामे ज़माना की मारिफ़त से महरूम हो, वह गुमराही की मौत मरता है।

  3. जो इमाम की मारिफ़त के बिना मरे, वह शिर्क की हालत में दुनिया से जाता है।

  4. इमामे ज़माना की मारिफ़त के बिना कोई अमल बारगाहे इलाही (अल्लाह की दरगाह) में क़ुबूल नहीं होता।

अब यह सवाल पैदा होता है कि इमामे वक़्त की मारिफ़त न होने पर इतने संगीन नतीजे क्यों बयान किए गए हैं?

इसकी वजह यह है कि अल्लाह तआला ने इंसान की पैदाइश ही मारिफ़त के लिए की है।

मुमकिन है यहाँ यह सवाल ज़हन में आए कि क़ुरआने करीम तो मक़सदे तख़लीक़ (सृष्टि का उद्देश्य) इबादत को क़रार देता है। चुनाँचे अल्लाह का इरशाद है:
"और मैंने जिन्नात और इंसानों को सिर्फ इसलिए पैदा किया है ताकि वे मेरी इबादत करें।"
तो फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि मक़सदे तख़लीक़ मारिफ़त है?

इसका जवाब यह है कि इबादत, मारिफ़त के बिना मुमकिन ही नहीं। इसी हकीकत को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने निहायत ख़ूबसूरती से बयान फरमाया।

रावी बयान करते हैं कि इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने अपने आबा (पूर्वजों) के वास्ते से नक़्ल फरमाया कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने असहाब (साथियों) से ख़िताब करते हुए फरमाया:
"ऐ लोगो! अल्लाह तआला ने बंदों को सिर्फ इसलिए पैदा किया है ताकि वे उसकी मारिफ़त हासिल करें। जब वे उसकी मारिफ़त हासिल कर लेंगे तो उसकी इबादत करेंगे, और जब उसकी इबादत करेंगे तो गैरुल्लाह (अल्लाह के सिवा) की इबादत से बेनियाज़ हो जाएंगे।"
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के इस इरशाद के बाद एक शख्स ने अर्ज़ किया:
"ऐ अल्लाह के रसूल की औलाद! मेरे माँ-बाप आप पर कुर्बान हों, अल्लाह की मारिफ़त से क्या मुराद है?"
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने फरमाया:
"हर ज़माने के लोगों के लिए अल्लाह की मारिफ़त यह है कि वे अपने उस इमाम को पहचानें जिसकी इताअत (आज्ञाकारिता) अल्लाह तआला ने उन पर वाजिब (अनिवार्य) क़रार दी है।"

इस हदीस से स्पष्ट होता है कि इमामे वक़्त की मारिफ़त ही वह अज़ीम मक़सद है जिसके लिए अल्लाह तआला ने इंसान को पैदा फरमाया है। लिहाज़ा जो शख्स जितना ज़्यादा अपने इमामे वक़्त की मारिफ़त हासिल करने की कोशिश करेगा, वह उतना ही अल्लाह तआला के क़ुर्ब (निकटता) का मुस्तहिक़ (पात्र) होगा, क्योंकि वह मक़सदे तख़लीक़ की तकमील (पूर्ति) की राह पर गामज़न है।

पस इस दौरे ग़ैबते कुबरा (बड़ी अनुपस्थिति) में हम पर रसूले अकरम (स.) के बारहवें और आख़िरी ख़लीफ़ा, हज़रत इमाम महदी (अल्लाह उनके फ़रज (प्रकटन) को जल्द फरमाए) की मारिफ़त वाजिब है, क्योंकि वही अल्लाह तआला की जानिब से तमाम मख़लूक़ात (सृष्टि) पर हुज्जत (प्रमाण) हैं। अहले बैत (अ.) के मकतब (विचारधारा) का यही अक़ीदा है कि अल्लाह तआला कभी भी ज़मीन को अपनी हुज्जत से ख़ाली नहीं रखता।

हदीसों की रौशनी में मारिफ़ते इमामे ज़माना

अब जबकि यह स्पष्ट हो चुका कि मारिफ़ते इमाम वाजिब है और इसके बिना इंसान गुमराही और हलाकत (विनाश) से महफूज़ नहीं रह सकता, तो यह सवाल पैदा होता है कि इस्लाम हमसे किस तरह की मारिफ़त का मुतालबा (माँग) करता है?

क्या सिर्फ यह जान लेना काफ़ी है कि इमाम कौन हैं? या इससे बढ़कर भी कोई हकीकत मतलूब (वांछित) है?

क़ुरआने करीम और हदीसों से मालूम होता है कि सिर्फ ज़ाहिरी (बाहरी) पहचान निजात (मुक्ति) के लिए काफ़ी नहीं।

अल्लाह तआला का इरशाद है:
"जब उनके पास वह किताब आई जो उनके पास मौजूद निशानियों की तस्दीक (पुष्टि) करने वाली थी, और वे पहले काफिरों पर फ़तह (विजय) की उम्मीद रखते थे, फिर जब उनके पास वह आ गया जिसे वे ख़ूब पहचानते थे तो उसका इनकार कर बैठे, पस अल्लाह की लानत हो काफिरों पर।"
इस आयत पर ग़ौर किया जाए तो मालूम होता है कि अहले किताब (किताब वाले) रसूले अकरम (स.) को अच्छी तरह पहचानते थे, लेकिन इसके बावजूद आपका इनकार कर दिया, जिसके नतीजे में वे अल्लाह की लानत के मुस्तहिक़ क़रार पाए।

इसी हकीकत को क़ुरआने करीम ने एक और मुक़ाम पर यूँ बयान फरमाया:
"जिन लोगों को हमने किताब अता की है, वे इस रसूल (पैग़ंबर) को उसी तरह पहचानते हैं जैसे अपने बेटों को पहचानते हैं, लेकिन उनमें से एक गिरोह जान-बूझकर हक़ (सत्य) को छुपाता है।"
यानी उन्हें रसूले ख़ुदा (स.) की नुबुव्वत (पैग़ंबरी) में कोई शक नहीं था, वे आपको अपने बेटों की तरह पहचानते थे, मगर फिर भी हिदायत (मार्गदर्शन) से महरूम रहे।

इससे मालूम हुआ कि सिर्फ पहचान लेना निजात के लिए काफ़ी नहीं, बल्कि ऐसी मारिफ़त मतलूब है जो ईमान, इताअत और तस्लीम (समर्पण) के साथ हो।

इस हकीकत को तारीख़ भी स्पष्ट करती है।

वाक़ए कर्बला (कर्बला की घटना) में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने शिमर से फरमाया:
"क्या तुम जानते हो कि मैं कौन हूँ?"
शिमर ने जवाब दिया:
"मैं आपको ख़ूब पहचानता हूँ। मैं जानता हूँ कि आपकी वालिदा (माँ) हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा हैं, आपके वालिद (पिता) अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम हैं और आपके नाना रसूले ख़ुदा (स.) हैं, लेकिन इसके बावजूद मैं आपको क़त्ल करूँगा।"
यह महज़ एक तारीख़ी वाक़िया नहीं बल्कि एक बहुत बड़ा सबक़ (शिक्षा) है। शिमर को इमाम की शख्सियत की पहचान थी, लेकिन उसने उन्हें अल्लाह की जानिब से वाजिबुल इताअत (जिनकी आज्ञाकारिता अनिवार्य है) इमाम तस्लीम (स्वीकार) नहीं किया, इसी लिए वह हमेशा के लिए लानत और जहन्नुम का मुस्तहिक़ क़रार पाया।

क़ुरआने करीम भी इरशाद फरमाता है:
"जो शख्स किसी मोमिन (ईमानवान) को जान-बूझकर क़त्ल करे, उसकी सज़ा जहन्नुम है, जिसमें वह हमेशा रहेगा, और अल्लाह का ग़ज़ब (क्रोध) और लानत उस पर होगी, अलावा इसके अल्लाह ने उसके लिए बड़ा अज़ाब (दंड) तैयार कर रखा है।"
पस स्पष्ट हुआ कि सिर्फ नसब (वंश), फज़ीलत (गुण) या शख्सियत की पहचान काफ़ी नहीं, बल्कि हक़ीक़ी मारिफ़त वह है जो इंसान को इमाम की विलायत और इताअत तक पहुँचा दे।

अब सवाल यह है कि अगर इमाम की मारिफ़त के बिना इंसान जाहिलियत की मौत मरता है, और सिर्फ ज़ाहिरी पहचान भी निजात के लिए काफ़ी नहीं, तो फिर वह कौन सी मारिफ़त है जो इंसान को जाहिलियत, गुमराही और हलाकत से निजात दिलाती है?

इसका जवाब यह है कि मारिफ़ते इमाम का पहला और बुनियादी मरहला (चरण) यह है कि इंसान इमाम को अल्लाह तआला की तरफ से मनसूब (नियुक्त) इमाम माने, इस बात पर यक़ीन रखे कि उनकी इताअत अल्लाह तआला की जानिब से वाजिब है, और दिलो-जान से उनकी विलायत को क़ुबूल करे।

इस हकीकत को मुतअद्दिद (अनेक) हदीसों ने स्पष्ट किया है। उनमें से एक रिवायत में हम्ज़ा बिन हिमरान बयान करते हैं कि उन्होंने इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम से अर्ज़ किया:
"मौला! मैं आप पर कुर्बान जाऊँ, इमाम के हक़ की मारिफ़त से क्या मुराद है?"
इमाम ने फरमाया:
"यह यक़ीन रखो कि वह अल्लाह तआला की तरफ से इमाम है और उसकी इताअत अल्लाह तआला की तरफ से वाजिब है।"

इस रिवायत की रौशनी में गुज़श्ता (पिछले) तमाम सवालों के जवाब भी स्पष्ट हो जाते हैं।

अहले किताब रसूले ख़ुदा (स.) को पहचानते थे, मगर उन्हें अल्लाह का बरहक़ (सच्चा) रसूल मानकर उनकी इताअत क़ुबूल करने पर आमादा (तैयार) न हुए, इसलिए उनकी ज़ाहिरी पहचान उन्हें निजात न दे सकी।

इसी तरह शिमर हज़रत इमाम हुसैन (अ.) को पहचानता था, उनके नसब (वंश) और मुक़ाम (स्थान) से भी वाक़िफ़ (परिचित) था, लेकिन उसने इमामे बरहक़ की इताअत के बजाय यज़ीद को अपना साहिबे अम्र (शासक) तस्लीम किया। यही हाल उमर बिन साद और दूसरे अफ़राद (व्यक्तियों) का भी था। वे इमाम हुसैन (अ.) की शख्सियत से नावाक़िफ़ (अनजान) नहीं थे, लेकिन उन्हें अल्लाह की जानिब से वाजिबुल इताअत (जिनकी आज्ञाकारिता अनिवार्य है) इमाम नहीं मानते थे, इसलिए उनकी पहचान उनके किसी काम न आ सकी।

चाहे इस इनकार का सबब दुनिया तलबी हो, इक़्तिदार (सत्ता) की ख़्वाहिश, मंसब (पद) का लालच या जान-ओ-माल का ख़ौफ़ (भय), नतीजा एक ही निकला कि वे सिराते मुस्तक़ीम (सीधे रास्ते) से हट गए और हमेशा की महरूमी (वंचितता) के मुस्तहिक़ (पात्र) बने।

इसी लिए कहा जा सकता है कि मारिफ़ते इमाम ही दरहक़ीक़त (वास्तव में) सिराते मुस्तक़ीम है, न कि सिर्फ़ लुग़वी (शाब्दिक) मायने में किसी को जान लेना या पहचान लेना।

इसी हकीकत (वास्तविकता) की तरफ सूरए फ़ातिहा की दुआ भी रहनुमाई (मार्गदर्शन) करती है:
"हमें सीधे रास्ते पर चला।"

बातिनी (आंतरिक) एतबार (दृष्टि) से इस दुआ का एक मफ़हूम (अर्थ) यह भी है कि:
"परवरदिगार! हमें इमामे बरहक़ की मारिफ़त, विलायत और इताअत के रास्ते पर साबित-क़दम (स्थिर) रख।"

लिहाज़ा मारिफ़ते इमाम का पहला क़दम यह है कि इंसान इमाम को मासूम (पवित्र), अल्लाह तआला की जानिब से मनसूब (नियुक्त) और वाजिबुल इताअत माने। इसके बाद जिस क़दर (जितना) इंसान की मारिफ़त में इज़ाफ़ा (वृद्धि) होता जाएगा, उसी क़दर उसकी इताअत, मुहब्बत, इख़लास (निष्ठा) और क़ुर्बे इलाही (अल्लाह की निकटता) में भी इज़ाफ़ा होता जाएगा।

इसी बिना पर बाज़ (कुछ) अफ़राद हज़रत सलमान फ़ारसी, हज़रत अबूज़र ग़िफ़ारी और हज़रत मिक़दाद जैसे बुलंद (उच्च) दरजात पर फ़ाइज़ (प्राप्त) हुए, क्योंकि उनकी मारिफ़त दूसरों से ज़्यादा कामिल (पूर्ण) थी।

यही वजह है कि बाज़ (कभी-कभी) एक ही अमल (कर्म) का सवाब (पुण्य) मुख़्तलिफ़ (भिन्न) अफ़राद के लिए मुख़्तलिफ़ होता है। मिसाल (उदाहरण) के तौर पर ज़ियारते इमाम हुसैन (अ.) के बारे में बाज़ रिवायतों में एक हज, बाज़ में इक्कीस हज, और बाज़ में हर क़दम पर एक हज का सवाब बयान हुआ है। इस तफ़ावुत (अंतर) की एक अहम वजह ज़ाइर (ज़ियारत करने वाले) की मारिफ़त का फ़र्क़ (अंतर) है। जिस क़दर मारिफ़त कामिल होगी, उसी क़दर अज्र-ओ-सवाब (प्रतिफल) भी ज़्यादा होगा।

अब सवाल यह है कि मारिफ़त में इज़ाफ़ा कैसे हासिल हो?

इसके जवाब में अबूहम्ज़ा सुमाली रिवायत करते हैं कि उन्होंने इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.) से अर्ज़ किया:
"मौला! अल्लाह तआला की मारिफ़त से क्या मुराद है?"
इमाम ने फरमाया:
"अल्लाह की तस्दीक़ (पुष्टि) करना, रसूले ख़ुदा (स.) की तस्दीक़ करना, अमीरुल मोमिनीन अली (अ.) की विलायत को क़ुबूल करना, उनकी पैरवी (अनुसरण) करना, तमाम आइम्माए हुदा (मार्गदर्शक इमाम) (अ.) की इमामत और विलायत का इक़रार (स्वीकार) करना, उनकी इताअत करना, और अल्लाह की बारगाह (दरगाह) में उनके दुश्मनों से बेज़ारी (अस्वीकृति) इख़्तियार करना, यही हक़ीक़ी (वास्तविक) मारिफ़त है।"

इस जामे (व्यापक) हदीस में इमाम ने मारिफ़त की तमाम हदूद (सीमाएँ) स्पष्ट फ़रमा दी हैं।

लिहाज़ा हक़ीक़ी मारिफ़त का मफ़हूम सिर्फ़ किसी शख्सियत को जान लेना नहीं, बल्कि यह है कि अल्लाह तआला ने जिन हस्तियों को अपने बंदों की हिदायत के लिए मुन्तख़ब (चुना) फरमाया, उन्हें अल्लाह की तरफ से मुक़र्रर-कर्दा (नियुक्त) रहबर (नेता), इमाम और हुज्जत (प्रमाण) माना जाए, उन पर कामिल (पूर्ण) ईमान रखा जाए, उनकी इताअत की जाए और उनके बताए हुए रास्ते पर साबित-क़दम रहा जाए। यही वह मारिफ़त है जो इंसान को जाहिलियत, गुमराही और हलाकत से बचाकर क़ुर्बे इलाही (अल्लाह की निकटता) तक पहुँचाती है।

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